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शुक्रवार, अगस्त 28, 2026

प्यारा सा है बंधन ये

भाई बहन का उत्सव आया,
राखी सजी कलाई पे।
 
बहना ने है स्नेह जताया,
आशीषें पाती भाई से।
 
नोक झोंक और हंसी ठिठोली,
प्यारा सा है बंधन ये।
 
प्रेम बंधा है इस धागे में,
और बहुत परवाह भी है।

भाई बहन का उत्सव आया,
राखी सजी कलाई पे। 

भईया मेरा सदा खुश रहे,
बहना करे दुआएं ये।
 
कितने सुंदर पल होते है,
राखी के इस उत्सव के।                              

अपनेपन का एहसास जहां हो,
और बचपन की यादें।

रक्षाबंधन की बहुत बहुत शुभकामनाए 


गुरुवार, जुलाई 16, 2026

आज फिर कुछ चलो सीख लें

 आज फिर कुछ चलो सीख लें  

हार हार कर चलो जीत लें ।

जो ना चाहे कभी सीखना 

क्या नही है उसे चेतना ।


कोशिश तो कर के देखें हम 

कुछ और कदम बढ़कर देखें हम ।

अपनी क्षमताओं को जानें 

हुनरमंद हम भी है माने।


घबराहट को पिछे छोडे,

नऐ जोश से अब हम दौडे ।

कहे खुद से अब बात वही,

उत्साह बढे और कर्म सही।


जिसने जीवन सवांरा नही,

ऐसा डर अब गवांरा नही ।

आज फिर कुछ चलो सीख लें  

हार हार कर चलो जीत लें ।

                                                                                                                                    

                   - नेहा मैथ्यूस

शुक्रवार, जनवरी 19, 2018

वो जैसा चाहता है


 सूरज से जैसे नही किरणें जुदा 
मैं जिसकी रौशनी तले 
वो है मेरा खुदा 

हरदम साथ है मेरे 
मैं उसके साथ हूँ 
हरदम बंदगी करता 
मैं उसकी बात हूँ |

बड़ी ये बात है 
ऐसा फिर कैसे कहूँ ?
वो जैसा चाहता है 
वैसा ही बनकर रहूँ |

सभी की प्रेरणा बनना 
नहीं आसन है ,
उस की राह पर चलना 
निरंतर ध्यान है |

हो ना पाए कोई भी 
मुझसे खता ,
वो सुधार कर भी दे 
मेरी गलती बता |

मैं उसको मानता दिल से 
वो है मेरा खुदा |

सूरज से जैसे नही किरणें जुदा 
मैं जिसकी रौशनी तले 
वो है मेरा खुदा

हरदम साथ है मेरे 
मैं उसके साथ हूँ 
हरदम बंदगी करता 
मैं उसकी बात हूँ |

- नेहा मैथ्यूस 


मंगलवार, फ़रवरी 10, 2015

क्या कठिन है ?

समय चलता है दोस्तों 
अपनी ही लय में 
तुम भी सुर मिला लो 
ना रहो चिन्ता या भय में 
फिर से लौटना 
बनकर विजेता 
क्या कठिन है ?
ईश्वर के लिखे में 
क्या नहीं रात दिन है ?
पंछी की मिसाल 
ये कवि जो 
दे रहा है 
उसका कहा 
तुमसे भी 
कुछ ना कुछ जुड़ा है 
उसको उड़ान 
फिर से देखो 
मिल गई है 
मंजिल सामने ही थी 
मगर लगती नई है 
क्या ये पहले तय था 
या अब हुआ है 
ईश्वर के लिखे का 
जान लो 
अपना मजा है। 
घर को लौटना 
कितना सुखद 
कितना भला है 
खोई राह 
फिर से खोजना 
फिर क्यों खला है। 
जादु सा ये कैसा 
आज कोई चला है 
इसके सार में देखो 
मुझको क्या मिला है ,
रुक रुक कर 
जो चल रही थी 
दौड़ती है 
मुश्किल रास्तों को 
अब नही वो 
छोड़ती है 
अनुभव से समझ आएगी 
ये जो जिन्दगी है 
ईश्वर के लिखे को 
मानना ही बन्दगी है। 



मंगलवार, फ़रवरी 03, 2015

एक गुलाब फिर खिला है


एक गुलाब फिर खिला है 
तोड़े गए फूलों के बीच 
उसको कुछ समय मिला है 
पौधा प्यार से रहा है सींच 

कलियाँ शायद सोच रही है 
हमको भी कुछ समय मिलेगा 
फूल को जैसा देख रही है 
धूप छाँव भर पेट मिलेगा 

या फिर लिया जाएगा तोड़ ?
नहीं ! हम भी लहलहाएँगी 
अपनी बगियाँ को छोड़ 
यूँ ही न चली जाएँगी, महकाएँगी 

रंगो से सजाएँगी , स्वप्न के यह थे, पल बस चंद 
आह!  फिर हुआ वही जिसका डर था, महक रह गयी मंद





                                                                                                            

मंगलवार, जनवरी 20, 2015

जीवन जी तो लें

नम आँखें है
दिल यादों में अब यूँ खो रहा है 
कहीं बादल बरस 
खुद में ही जो गुम हो रहा है 

गम से जो निकल 
खुशियों के आँसु रो रहा है 
नए सपने जमीं पर 
जैसे कोई बो रहा है 

उड़ने को 
तैयार पर होने लगे है 
अपनी हर हिचक को 
जैसे अब खोने लगे है 

सपनो का महल 
जमीं पर बनने लगा है 
जीवन जी तो ले 
अब मन यही करने लगा है 

आओ बढ़ चलें 
गिर भी पड़े तो डर नहीं है 
फिर से थाम ले आ कर 
वो ईश्वर भी यहीं है। 


                                                                                                          

मंगलवार, सितंबर 18, 2012

हर कोई खुद में खास है

तेरी हथेली पर सबकुछ 
मेरी मुट्ठी में आस है
ईश्वर ने तुझको भी दी
मुझको भी दी श्वास है
हर कोई खुद में खास है।

मै भी सफल बनूँ  इक दिन
बस अवसर की तलाश है
तुझ सी बात है मुझ में भी
ऐसा मेरा विश्वास है
  हर कोई खुद में खास है।

सबके लिए है धरती
सबके लिए आकाश है
मंजिल ढूंढ़ ने वालों को
ढूंढ़ लेता प्रकाश है
हर कोई खुद में खास है।



                                                                                           

मंगलवार, सितंबर 04, 2012

जब सपना कोई पूरा हो

जब सपना कोई पूरा हो  
ख़ुशी न हो सकती बयान 
धड़कन ही सब कहती है 
सुनते जमीन और आसमान।

किस्मत यूं दिखने लगती
पुरे होते जब अरमान   
जैसे ईश्वर खुद आए 
जीवन में बनकर मेहमान।

हाथ बढाए खडी हुई
 लेती राहें अब मेरा नाम 
जो राहें बनती थी 
इस से पहले मुझसे अन्जान।

जब सपना कोई पूरा हो
ख़ुशी न हो सकती बयान 
धड़कन ही सब कहती है 
सुनते जमीन और आसमान।



शुक्रवार, जुलाई 20, 2012

पृथ्वी पर बढ़ रही तपन

पृथ्वी पर बढ़ रही तपन,
पिघल रहे हिमपर्वत हर क्षण
कटते जा रहे सारे वन
मुश्किल आ पड़ी भीषण
पृथ्वी पर बढ़ रही तपन,
पिघल रहे हिमपर्वत हर क्षण
क्रंदन कर रहा कण-कण
खतरे मैं है पर्यावरण
फिर क्यूँ नहीं पिघलता मानव मन?
क्यूँ नहीं पिघलता मानव मन?


गुरुवार, जुलाई 19, 2012

थैंक यू God!

अच्छे और बुरे में 
फर्क बताया थैंक यू 
इसीलिए ये सारा 
खेल रचाया, थैंक यू 
पहले पहल लगा,  
क्या लोग ऐसे भी होते है ?
वो बोले तो जाना कि 
तेरा मैसेज क्या है, थैंक यू 
जीवन का एक और 
पाठ पढाया,थैंक यू 
एक बार फिर मेरा 
साथ निभाया,थैंक यू !
थैंक यू !

मंगलवार, जून 26, 2012

समय और मनुष्य

(1)
कल के भरोसे -
वक्त हाथ से 
फिसलता रहा ,
टलता रहा,
खलता रहा,
और यह सब यूँही 
चलता रहा।

(2)
सोचता हूँ घडी 
बदल डालूं ,
कुछ है 
जो रोकता है,
उसकी धुल हटा लूँ 
फिर देखू वक्त क्या है।

(3)
दिन मुश्किल है मगर 
शाम आज भी होगी,
मुश्किलों पे जीत पाकर 
हैरान वो आज भी होगी।

(4)
वह तब भी टिक टिक करती थी,
वह अब भी टिक टिक करती है,
अब उसकी यह टिक टिक 
जाने क्यूँ अच्छी लगती है,
शायद मेरे सोचने का 
नजरिया बदल गया,
समय तुम्हारी ताकत 
मैं भी संभल गया।



सोमवार, अगस्त 22, 2011

कान्हा कान्हा कहे मेरा मन


भक्त- 
कान्हा कान्हा कहे मेरा मन, कान्हा जाने कहाँ छुपा 
मुरली की आवाज़ सुना दे, इतनी तो कर दे कृपा |

कान्हा-
कान्हा कहे मैं तेरे ह्रदय में, रहता हूँ , रहूँगा सदा 
तू मुझको कहाँ पर ढूंढे , तेरे पास ही तो है पता|


भक्त-
कभी गुरु में , कभी पिता में मैंने तुझको देखा है
कभी भाई में , कभी सखा में भेस बदलकर बैठा है|

कान्हा-
कभी गुरु , कभी पिता , कभी भाई और कभी सखा
इन सब अवतारों में, मैं तो तेरे लिए ही बना - मिटा|

भक्त-
मिल गया अब मुझको कान्हा , नहीं, वह तो साथ ही था 
जब जब आशीर्वाद मिला था , सर पर उसका हाथ ही था|

कान्हा-
सच्चे भक्त का हाथ थामकर , मैं राह दिखलाता हूँ
धर्मं हो या कर्मभूमि हो , साथ हूँ , सारथी कहलाता हूँ|

मंगलवार, अप्रैल 12, 2011

सम्पूर्ण सृष्टि करें नमन

सम्पूर्ण सृष्टि करें नमन 
कितना स्नेहिल तेरा मन 
तुने दिया है यह जीवन
तुझको करती हूँ अर्पण |

नन्ही सी किलकारी से 
तु कितनी खुश हो जाती थी
ऐ माँ तेरी हर लोरी 
मन में मिठास दे जाती थी |

नन्हे नन्हे क़दमों को 
जब तु चलना सिखलाती थी 
ऐ माँ तेरे क़दमों से 
मैं अपने कदम बढाती थी |

तेरे हाथों से खाया जो 
प्यार भरा हर एक कौर 
पेट भर भी जाये तो 
जी कहता है माँ और और  |

तेरी ममता की मुस्कान 
मेरे दिल को छु जाती है 
ऐ माँ तेरी हर एक सीख 
अमिट छाप दे जाती है |

घनी धुप में छाँव वृक्ष की 
सुख का आभास कराती है 
ऐ माँ तेरी ममता भी 
कुछ ऐसा अहसास कराती है |

सम्पूर्ण सृष्टि करें नमन 
कितना स्नेहिल तेरा मन 
तुने दिया है यह जीवन
तुझको करती हूँ अर्पण |



गुरुवार, नवंबर 04, 2010

माँ बाप का प्यार क्यों भूल गए?

याद करो वह बीते पल
जब माँ बाप की गोद में खेले थे
याद करो वह बीते पल 
जब उनसे चलना सीखे थे
याद करो वह बीते पल
जब उन्होंने संस्कार दिए
याद करो वह बीते पल
जब तुम्हे खिलाया खुद भूखे रहे
याद करो वह बीते पल
जब तुम्हे पढाया लिखाया
तुम्हे काबिल इन्सान बनाया
तुम अब अपने परिवार में 
उनका नाम क्यों भूल गए
उन्होंने तुम को सब कुछ दिया
तुम उनकी लाठी बनना भूल गए
तुमने उनको धुतकारा
उनका प्यार क्यों भूल गए?
उन्होंने अपना फर्ज निभाया
तुम अपना फर्ज क्यों भूल गए?
माँ बाप का नाम क्यों भूल गए?
माँ बाप का प्यार क्यों भूल गए?

बुधवार, नवंबर 03, 2010

जिस वसुधा पर जन्म लिया

जिस वसुधा पर जन्म लिया 
जिसने तुझको पुत्र कहा 
उस वसुधा की सम्पति को 
ए पुत्र तु मिटा रहा 
इस वसुधा के नयनों का 
नीर तू बहा रहा
इस वसुधा के हाथ तरु है
उसको तु कटा रहा
जिस वसुधा पर जन्म लिया 
जिसने तुझको पुत्र कहा 
जलवायु और पेड़ों द्वारा 
उसने तेरा अस्तित्व बचाए रखा
ए पुत्र तू अपने हाथों से
अपना अस्तित्व मिटा रहा|

सोमवार, नवंबर 01, 2010

विज्ञापनों से डर लगता है

कार्यक्रमों के बीच
अचानक से टपकते है|
अख़बारों में भी
धड़ल्ले से छपते है|
सड़कों,खम्बों,दीवारों पर
च्विंगम से चिपकते है|
हर जगह दिख जाते
ये अनचाहे वक्ता है
विज्ञापनों से डर लगता है|
कही पान की पीकों से लदे
कही फटें, उखड़े
प्रकृति को छुपाते
विशाल होर्डिंग्स में लगे|
अब तो उत्तर भी दक्षिण को
देखने को तरसता है
विज्ञापनों से डर लगता है|
नेट पर हार गया लगता है
पॉप अप ब्लोकर
सब के सामने बन जाता है
कैसे जोकर
पॉप अप को क्लोस कर करके
हम थकता है
विज्ञापनों से डर लगता है|
बच्चों से लेकर बड़ों ने
रट डाले है
विज्ञापनों ने ऐसे बुने जाले है
अच्छा बुरा सभी
यह बकता है
विज्ञापनों से डर लगता है|

शनिवार, अक्टूबर 30, 2010

मेरी पहली प्रकाशित कविता

आज में आपसे बांटने वाली हूँ ,मेरी पहली प्रकाशित कविता|यह कविता २००४ में दैनिक भास्कर,स्कूल भास्कर में प्रकाशित हुई थी|यह मेरे लिए एक यादगार दिन था और एक शुरुआत भी|कविता का शीर्षक है फील गुड फैक्टर |

फील गुड फैक्टर

लो जंगल में भी आ गया
फील गुड फैक्टर
हाथी इतरा रहा है,
अपनी मस्त चाल पर
बन्दर कूद रहा है मस्ती से डाल पर|
गधे खुश है बनके पॉप सिंगर
चतुर लोमड़ी कह रही
घी में है पांचों फिंगर|
बिल्ली कह रही है अब चूहे नहीं खाऊँगी
घरों में दूध ही दूध है 
जाके चाट कर जाउंगी|
बैल कह रहे है अब मैं न बेरोजगार हूँ|
हरित क्रान्ति आई है खेतों में हल
जोतने को तैयार हूँ|
खरगोश कह रहें है जमकर 
गाजर-मुली खाऊंगा
फील गुड आया है इसका
लाभ उठाऊंगा|
ऊंट कह रहे है रेगिस्तान में जाऊंगा
पर्यटक आते है उनको लुभाऊंगा|
मोर नाच रहा है बिन बारिश के
पंछी खुश है खुला आकाश है
शेर की हो गई आँखें नम
करता है भगवान से दुआ
हमारे भी दूर हो जाये सारे गम|
सभी खुश है अंदाज
फील गुड का देखकर लो जंगल में भी आ या
फील गुड का फैक्टर|






                                                                  

गुरुवार, अक्टूबर 28, 2010

ऐसे न होता तो क्या होता

पहाड़ों की ओट से
सूरज कैसे निकलता है
इमारतों के बीच
एक झरोखा तो होता|
बच्चे हँसते खेलते स्कूल जाते
कंधे पर भारी बस्ता न होता|
ऐसे न होता तो क्या होता|
खुली सड़क और खुले मैदान होते
पहियों से लदा रास्ता न होता|
माएं घर संभालती
पिता काम पर जाते
महंगाई से हाल खस्ता न होता|
ऐसे न होता तो क्या होता|
लोग पौष्टिक भोजन लेते
जंक फ़ूड का नाश्ता न होता|
पाँव भाजी या डोसे का आर्डर देते
अगर पिज्जा  और पास्ता न होता|
ऐसे न होता तो क्या होता|
पहाड़ों की ओट से
सूरज कैसे निकलता है
इमारतों के बीच
एक झरोखा तो होता|


गुरुवार, अक्टूबर 21, 2010

प्रकृति के खुबसूरत नज़ारे

ये चाँद ये सूरज ये आसमान ये तारे
ये पृथ्वी ये पेड़ ये पोधे हमारे
यही तो है प्रकृति के खुबसूरत नज़ारे
हमारा जीवन इन्ही के सहारे
ये चाँद जो रात मे रोशनी कर दे
ये सूरज जो दिन को उजाले से भर दे
ये आसमान जो इनको संजोये हुए है
ये तारे जो इनकी खुबसूरती बने है
ये पृथ्वी जिसकी गोदे में है हम रहते
ये पेड़ जो हमको स्वच्छ वातावरण देते 
ये पोधे जो फूलों की खुशबू से महकते
यही तो है प्रकृति के खुबसूरत नज़ारे
हमारा जीवन इन्ही के सहारे|


बुधवार, अक्टूबर 20, 2010

नई सुबह

आती हर रोज सुबह
पर हमें है उस सुबह का इंतजार
जब सब देश एक होंगे
और बनेगा प्यारा संसार|
न होगी नफ़रत की दीवार 
बस होगी खुशियों की बौछार
हमें है उस सुबह का इंतजार
जब सब देश एक होंगे 
और बनेगा प्यारा संसार|
सब धर्मं एक हो जायेंगे
सब ईश्वर एक कहलायेंगे
न होगा आतंकवाद
न होगा कोई भेदभाव
न होगी कोई बुराई
हर तरफ होगी बस 
अच्छाई और सच्चाई|
कब आएगी वह नई सुबह
जब सब देश एक होंगे
और बनेगा प्यारा संसार|
हमें है उस नई सुबह का इंतजार| 
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धन्यवाद
नेहा मैथ्यूज़