वृक्ष के झुरमुट को जब जब
पवन ने दिया झिंझोड
भीतर छुपे फलों को उसने
फिर फिर दिया तोड ,
फलों का स्वाद चखा जिसने भी
उसने कहा वाह
ऐसा स्वाद् फिर पाने को
पूछी उसने राह ।
उड़ता आया नन्हा पंछी
उसने ध्यान लगाया
वृक्ष फलों की इस मिठास का
उसने राज बताया ,
डाली और तने में उनके
हमने संसार सजाया
और देखो कैसे उन ने
हर पल साथ निभाया ।
गर्मी से आहत राही को
पेडों ने दी छाँह ,
बेगानी सी दुनिया में
पहचानी सी बाँह ।
समय के साथ खुद के विचार में
वही स्वाद् जब पाया ,
समझ गया वह परोपकार फिर
औरो को समझाया ।
आलोचना से ना घबराना
वो है सच्ची साथी ,
जैसे पवन के एक झोंके से
फलों को मिल गई ख्याती ।
इस छोटी सी दुनिया में आपको मिलेंगी मेरी रचनाएं और कुछ अपनों के दिल से निकली बातें, यादें जिन्हें संजो कर रखना अच्छा लगता है.....
बुधवार, जुलाई 15, 2015
परोपकार
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
" इस ब्लॉग पर पोस्ट की गई सभी रचनाएँ मौलिक है जो की मेरी और मेरे परिवार के सदस्यों द्वारा लिखी गई है " | किताबों व अन्य प्रोडक्ट्स पर दी जानकारी अनुभव आधारित है |
धन्यवाद
नेहा मैथ्यूज़
लेबल
Books I Read
(2)
Spiritual Books I Read
(2)
coin collection
(3)
कविता
(22)
कान्हा मेरे
(14)
चित्र
(2)
डिजिटल आर्ट
(2)
दादाजी की शायरी
(10)
दोहे
(1)
नव लेख
(4)
प्रकाशित रचनाएँ
(3)
बाल कविताए
(20)
भक्ति काव्य
(5)
माँ
(2)
मेरी मम्मी की डायरी से...
(8)
मेरी लाइब्रेरी
(2)
यादों का मेला
(8)
लघुकथा
(1)
लवलीना
(8)
लेख
(8)
विविध
(3)
संस्मरण
(11)
सिक्कों की दुनिया
(3)
हाइकु
(4)
एकदम सच...खूबसूरत कविता !
जवाब देंहटाएं