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गुरुवार, जुलाई 16, 2026

आज फिर कुछ चलो सीख लें

 आज फिर कुछ चलो सीख लें  

हार हार कर चलो जीत लें ।

जो ना चाहे कभी सीखना 

क्या नही है उसे चेतना ।


कोशिश तो कर के देखें हम 

कुछ और कदम बढ़कर देखें हम ।

अपनी क्षमताओं को जानें 

हुनरमंद हम भी है माने।


घबराहट को पिछे छोडे,

नऐ जोश से अब हम दौडे ।

कहे खुद से अब बात वही,

उत्साह बढे और कर्म सही।


जिसने जीवन सवांरा नही,

ऐसा डर अब गवांरा नही ।

आज फिर कुछ चलो सीख लें  

हार हार कर चलो जीत लें ।

                                                                                                                                    

                   - नेहा मैथ्यूस

गुरुवार, जनवरी 01, 2026

A glorious second chance


My art is lost somewhere, Oh Krishna please find it for me.

You are the only one who can help me.


Nobody but you can bring me back my might.

Nothing in three world Is hidden from your sight.


You said in the Gita that from you comes remembrance,

Knowledge and forgetfulness.


My forgetfulness must have been your plan,

I have faith dear Krishna 

you will give me a glorious second chance.


You made me invest my time in studies

And made the scriptures my best buddies.


So that I can learn and speak what is truthful,

what is pleasing and what is fruitful.


Oh Krishna you are sitting within my heart

I am a surrendered soul for you will be my art.


You say you are a friend of a surrendered soul.

This life is for you, please tell me my role.


revive my art, please give me a chance

I am standing still, please make me dance.


Oh sweet lord Whose hairs are curled.

I want to tell your glories to the world


 Oh dear lord whose flute enchants.

I am waiting dear Krishna for your merciful glance.


My art is lost somewhere Oh Krishna please find it for me.

You are the only one who can help me.

  

                                                          

                                                                                         Neha ki kalam se…


कान्हा


वो सबका सच्चा दोस्त, 

हर मुश्किल से बचाता है । 

गर हाथ उसका थाम लो 

वो  हर क्षण साथ निभाता है ।


जन्मों जन्मों का नाता उस से, 

वो मेरे मन को भाता है ।

कितनी सुन्दर छवि है उसकी,

वो मनमोहन कहलाता है ।


हर दुःख तकलीफ भुला दे और  

मुख पर मुस्कान सजाता है ।

वो ही सच्चा सुखदाता  है 

वो  तो गोविन्द कहलाता है ।


कर्त्तव्य की राह दिखाता वो 

और सही गलत बतलाता है ।

शरणागत की रक्षा करता, 

वो तो गिरधर कहलाता है ।


माया के जाल से बचा हमें,

आध्यात्म की राह दिखाता है ।

मुक्ति का वो दाता है, 

वो तो मुकुंद कहलाता है ।


वो मालिक सारी दुनिया का,

मदद करने खुद आता है ।

वो ही तो सबका दाता है,  

वो तो माधव कहलाता है ।


भक्तों का कर्ता धर्ता, 

वो अद्भुत लीला करता है ।

कष्टों को हर लेता है 

वो तो हरि कहलाता है ।


मुरली की तान सुनाता है 

माखन और मिश्री खाता है 

वृन्दावन का प्यारा लाला 

वह तो कान्हा कहलाता है ।                        

                                       

                                                  -  नेहा की कलम से…





कान्हा मेरे

कान्हा मेरे 

तेरी भक्ति हर साँस मैं करूँ 

भूलूं न तुझको मैं कभी

तेरे पास ही रहूं । 

कान्हा मेरे ।


कान्हा तेरा नाम ही 

जीवन का है आधार 

जिसके बिना लगता मुझे 

फिका सा ये संसार ।


ये मौका भी तो तुमने दिया

लिखूं तुम्हारे गीत,

कृपा से तेरी बन गया

जीवन मधुर संगीत ।


कान्हा मेरे 

तेरे प्रेम की सदा आस मैं करूँ 

भूलूं न तुझको मैं कभी

तेरे पास ही रहूं । 

कान्हा मेरे ।


हृदय में स्मरण रहे तेरा

लूं जब मैं आखिरी सांस ।

ये वादा भी तो तुम्ही ने किया,

थामोगे फिर तुम हाथ ।


जीवन मरण के चक्र से

छूट जाऊ अबकि बार,

कान्हा मेरी नैया को 

लगा भी दो अब पार।


कान्हा मेरे 

तेरी कृपा पर विश्वास मैं करूँ 

भूलूं न तुझको मैं कभी

तेरे पास ही रहूं । 

कान्हा मेरे ।



                                  -   नेहा की कलम से...








शुक्रवार, जनवरी 19, 2018

वो जैसा चाहता है


 सूरज से जैसे नही किरणें जुदा 
मैं जिसकी रौशनी तले 
वो है मेरा खुदा 

हरदम साथ है मेरे 
मैं उसके साथ हूँ 
हरदम बंदगी करता 
मैं उसकी बात हूँ |

बड़ी ये बात है 
ऐसा फिर कैसे कहूँ ?
वो जैसा चाहता है 
वैसा ही बनकर रहूँ |

सभी की प्रेरणा बनना 
नहीं आसन है ,
उस की राह पर चलना 
निरंतर ध्यान है |

हो ना पाए कोई भी 
मुझसे खता ,
वो सुधार कर भी दे 
मेरी गलती बता |

मैं उसको मानता दिल से 
वो है मेरा खुदा |

सूरज से जैसे नही किरणें जुदा 
मैं जिसकी रौशनी तले 
वो है मेरा खुदा

हरदम साथ है मेरे 
मैं उसके साथ हूँ 
हरदम बंदगी करता 
मैं उसकी बात हूँ |

- नेहा मैथ्यूस 


मंगलवार, मार्च 10, 2015

हाइकु ४

१  नील गगन
    सतरँगी चुनर
    हर्षाए मेघा ।

२   बादल राग
     फिर लेकर आई
     बरखा रानी ।

३   मोर मोरनी
     हरियाली का गीत
     शुभ आशीष ।

४   अरसे बाद
     बरसात का गीत
     फिर सुना है ।

                                                                       लेखक - नेहा मैथ्यूज़ 

मंगलवार, मार्च 03, 2015

हाइकु ३

नीला आकाश
कोरा लग रहा है 
चलो रंग दे। 

२ 
रंगो में छिपा 
कहां है मेरा लाल 
होली में हाल। 

३ 
उड़े गुलाल 
आई फागुन बेला 
मचे धमाल। 

४ 
रंगों की थाल 
सुशोभित आँगन 
उत्सव आया।

                                                                      लेखक - नेहा मैथ्यूज़

मंगलवार, फ़रवरी 24, 2015

दोहे

1
 भारत माँ के सब बच्चे,यूँ लगते है संग 
साथ मिलकर ज्यों सजते,रंगोली के रंग।

2
अपनी छोड़ी राह पे,पथिक को था गुमान
पिछे मुड़कर देख रहा,ना चाहे सामान।


खुद को गर है जानना,साधो थोड़ा मौन 
अंतर की आवाज से,जानो तुम हो कौन।

4
अपने मन की सब कहे, दुजे का ना ध्यान ।
अपने माथे जब पड़ी, तब मिल पाया ज्ञान ।।

5
आंगन में धूप उतरे, नया सवेरा लाय।
कर्मरत जो रहे सदा, वो ही अवसर पाय।।

6
सबको जिसकी खोज है, कहते जिसको ज्ञान।
योग्यता से ही मिलता, पाना ना आसान ।।

7
निखर निखर है निखरता, बेहद इसका दाम।
हीरा यूं ही ना बना, करता है अभिमान।।

8
सागर जितना गहन है, सरल ना अनुमान।
मनुज की छिपी क्षमता, रत्नों की ज्यों खान।।

9
आंगन के बीच चमकें, रोशन हो घर द्वार।
दीप फैलाय रोशनी, इसका है उपकार।।

मंगलवार, फ़रवरी 10, 2015

क्या कठिन है ?

समय चलता है दोस्तों 
अपनी ही लय में 
तुम भी सुर मिला लो 
ना रहो चिन्ता या भय में 
फिर से लौटना 
बनकर विजेता 
क्या कठिन है ?
ईश्वर के लिखे में 
क्या नहीं रात दिन है ?
पंछी की मिसाल 
ये कवि जो 
दे रहा है 
उसका कहा 
तुमसे भी 
कुछ ना कुछ जुड़ा है 
उसको उड़ान 
फिर से देखो 
मिल गई है 
मंजिल सामने ही थी 
मगर लगती नई है 
क्या ये पहले तय था 
या अब हुआ है 
ईश्वर के लिखे का 
जान लो 
अपना मजा है। 
घर को लौटना 
कितना सुखद 
कितना भला है 
खोई राह 
फिर से खोजना 
फिर क्यों खला है। 
जादु सा ये कैसा 
आज कोई चला है 
इसके सार में देखो 
मुझको क्या मिला है ,
रुक रुक कर 
जो चल रही थी 
दौड़ती है 
मुश्किल रास्तों को 
अब नही वो 
छोड़ती है 
अनुभव से समझ आएगी 
ये जो जिन्दगी है 
ईश्वर के लिखे को 
मानना ही बन्दगी है। 



मंगलवार, फ़रवरी 03, 2015

एक गुलाब फिर खिला है


एक गुलाब फिर खिला है 
तोड़े गए फूलों के बीच 
उसको कुछ समय मिला है 
पौधा प्यार से रहा है सींच 

कलियाँ शायद सोच रही है 
हमको भी कुछ समय मिलेगा 
फूल को जैसा देख रही है 
धूप छाँव भर पेट मिलेगा 

या फिर लिया जाएगा तोड़ ?
नहीं ! हम भी लहलहाएँगी 
अपनी बगियाँ को छोड़ 
यूँ ही न चली जाएँगी, महकाएँगी 

रंगो से सजाएँगी , स्वप्न के यह थे, पल बस चंद 
आह!  फिर हुआ वही जिसका डर था, महक रह गयी मंद





                                                                                                            

मंगलवार, जनवरी 27, 2015

साईकिल की सवारी [ संस्मरण ]

भरी दुपहरी में जब सभी लोग अपने घरों में  सो रहे होते तब मैं घर के बाहर अपने भाई की पुरानी खराब पड़ी साईकिल के पास बैठी रहती और एक ही सपना देखती उस साईकिल की सवारी का, उसे चला पाने का। तब तक मुझे साईकिल चलाना कहां आता था। मैं  सपना देखती थी  ऐसे साईकिल चलाऊँगी, वैसे चलाऊँगी,  कभी एक हाथ छोड़कर चलाऊँगी, कभी ढलान से उतारते हुए लाऊँगी और घर के बाहर लाकर रोकूँगी फिर जोर से आवाज़ लगाऊँगी "  कुल्वेन्दर "!  दरअसल भईया के दोस्त उसे ऐसे ही बुलाने आते जो कि मुझे बड़ा कूल लगता था। यह मेरे बचपन की उन सुनहरी यादों में से है जिन से उस बालसुलभ मन की याद हो आती है और एक हल्की सी स्माइल दे जाती है।
          
           -  नेहा मैथ्यूज 

                                                                                                                                  

मंगलवार, जनवरी 20, 2015

जीवन जी तो लें

नम आँखें है
दिल यादों में अब यूँ खो रहा है 
कहीं बादल बरस 
खुद में ही जो गुम हो रहा है 

गम से जो निकल 
खुशियों के आँसु रो रहा है 
नए सपने जमीं पर 
जैसे कोई बो रहा है 

उड़ने को 
तैयार पर होने लगे है 
अपनी हर हिचक को 
जैसे अब खोने लगे है 

सपनो का महल 
जमीं पर बनने लगा है 
जीवन जी तो ले 
अब मन यही करने लगा है 

आओ बढ़ चलें 
गिर भी पड़े तो डर नहीं है 
फिर से थाम ले आ कर 
वो ईश्वर भी यहीं है। 


                                                                                                          

मंगलवार, जनवरी 13, 2015

जलप्रपात की यात्रा [संस्मरण ]

जलप्रपात को प्रत्यक्ष रूप से देखना यह मेरा पहला ही अनुभव था । कितना सुरम्य,कितना अभिभूत कर देने वाला दृश्य है यह। झरने तक पहुँचने के लिए जितनी सीढियाँ उतरते उतना ही वो समीप आने के लिए बाध्य करता। दूधिया झरने की धाराए अनगिनत बूँदों में  बदल जब पहली बार हम पर पडी तो  लगा मानो बरसात हो रही है फिर समझ आया  कि यह बारिश का आभास मात्र है।
सीढियाँ उतरते वक्त  हम बिना किसी दिक्कत उस  विशाल प्राकृतिक वाद्य के सुरों की ओर तथा उस मंच पर झूमते अठखेलियाँ  करते लोगों के इस अप्रतिम दृश्य की ओर एक  प्रशंशक की भाँति खींचे चले गए  पर्यटकों को झरने में खतरनाक फिसलन भरी चट्टानों के आस पास सहजता से खड़ा देख ऐसा लगता कि क्या इन्हे डर नहीं। उनमे हमारे साथी सदस्य भी खडे विभिन्न पोज़ में तस्वीरें  खींचा रहे है , भई  हम में तो इतना दुःसाहस नही। एक दो बार तो वहां खड़े होने की कल्पना मात्र से ही सिहर उठे। बार बार उनकी ओर वापिस आने को हाथ हिला रहे है पर किसी को मॉडलिंग से फुर्सत कहां।
अब हमारे भीतर का नौसीखियां फोटोग्राफर बाहर आने को कुलबुलाने लगा। इधर उधर से पढ़े फोटोग्राफी के ज्ञान को जैसे परखने का मौका मिल गया। बैकग्राउंड, पर्सपेक्टिव, लाइट इफ़ेक्ट  कई सारे वर्ड्स आइडियाज बनकर दिमाग में घूम  रहे है। बहुत तस्वीरें ली और अपने परिवार के  सदस्यों को दिखाकर उनका चेहरा पढ़ने की कोशिश कर रहे है पर देखिए कोई समझता ही नहीं , कोई तारीफ का एक शब्द भी नही कहता।
हमने हार मानकर कैमरा दूसरे को पकडा दिया और प्रकृति को शान्त मन से निहारना ही ठीक समझा। वाह क्या दृश्य है मन प्रफुल्लित हो गया।
देखते ही देखते लौटने का वक्त हो आया पर लौटते वक्त चढ़ाई ऐसी कि पिंडलियों की सारी मांसपेशियां मानो थककर वही पसर जाने को मजबूर होने लगी। और फिर कोई ठोर देखकर हम पैर पसार वहीँ बैठ गए कोई परवाह नहीं कि हमारे चेहरें के हावभाव अगर किसी ने देख लिए तो सदा धीर गंभीर दिखने वाला हमारा चेहरा अपने कुछ और भाव सामने ले आएगा जिसे देखकर किसी की भी हँसी छूट पडे । कुछ सम्भलते ही इस बात का एहसास हुआ, तब तुरंत ही नजरें बाकि  लोगों की तरफ गई ,बाकि सभी का भी यही हाल देखकर एक हल्की सी परेशान मुस्कान ने एक दूसरे को समझ लिया। फिर कुछ देर विश्राम कर निकल पडे अगली मंजिल की ओर।

                                                 
                       
     - नेहा मैथ्यूज

गुरुवार, नवंबर 21, 2013

टूटता मनोबल [लघुकथा]

वह पढाई से लेकर खेलकूद तक सब में  अच्छी थी। सब कहते यह एक दिन  हमारा नाम जरुर रोशन करेगी। कई दिन की बीमारी के  बाद वो स्कूल लौटी।विद्यालयी खेलों के लिए बच्चों को चुना जा रहा था। सभी को मैदान के अन्तिम  छोर तक दौड़कर  फिर से प्रवेश द्वार तक पहुँचने को कहा गया। वह कहती रही "मैं नहीं कर सकती।" "मैं  नहीं दौड़ पाऊँगी।" पर किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। मजबूरन उसे सबके साथ  दौड़ना ही पडा। वह अपनी सारी ताकत जुटाकर भी  मुश्किल से आधे रास्ते  तक ही दौड़ पाई थी कि सांस भरने  लगी,हिम्मत छूटती गई, कदम धीमे पडते चले गए। रही सही ताकत जुटाकर  जैसे तैसे चली जा रही थी। रोना तो जैसे अब आया तब आया। वह खुद से कहती रही "मैंने कहा था,मैं नहीं कर सकती। मैं नहीं दौड़ पाऊँगी।" मैदान के अन्तिम छोर तक  पहुँच कर  जब मुड़कर देखा तो पाया कि सब बहुत  पहले ही अपनी रेस पूरी कर चुके थे और वो सबसे पीछे छूट गई। वह रूआँसी थके  निराश कदमों से उस ओर लौटने लगी। 
कहते है डूबते हुए को तिनके का सहारा ही बहुत होता है,काश उस दिन एक टूटते हुए मनोबल को कोई बचा लेता।   
                                                                                                                   
     - नेहा मैथ्यूज

मंगलवार, सितंबर 18, 2012

हर कोई खुद में खास है

तेरी हथेली पर सबकुछ 
मेरी मुट्ठी में आस है
ईश्वर ने तुझको भी दी
मुझको भी दी श्वास है
हर कोई खुद में खास है।

मै भी सफल बनूँ  इक दिन
बस अवसर की तलाश है
तुझ सी बात है मुझ में भी
ऐसा मेरा विश्वास है
  हर कोई खुद में खास है।

सबके लिए है धरती
सबके लिए आकाश है
मंजिल ढूंढ़ ने वालों को
ढूंढ़ लेता प्रकाश है
हर कोई खुद में खास है।



                                                                                           

मंगलवार, सितंबर 04, 2012

जब सपना कोई पूरा हो

जब सपना कोई पूरा हो  
ख़ुशी न हो सकती बयान 
धड़कन ही सब कहती है 
सुनते जमीन और आसमान।

किस्मत यूं दिखने लगती
पुरे होते जब अरमान   
जैसे ईश्वर खुद आए 
जीवन में बनकर मेहमान।

हाथ बढाए खडी हुई
 लेती राहें अब मेरा नाम 
जो राहें बनती थी 
इस से पहले मुझसे अन्जान।

जब सपना कोई पूरा हो
ख़ुशी न हो सकती बयान 
धड़कन ही सब कहती है 
सुनते जमीन और आसमान।



सोमवार, सितंबर 03, 2012

शेष कार्य


अवचेतन मन जो दे रहा 
वह ईश्वर का सन्देश है 
चेतन को अब कदम बढ़ाना 
कार्य रह गया शेष है ।

मेरा सफलता के लिए मंत्र  -  
GOOD IDEA + RIGHT ACTION = SUCCESS 


शुक्रवार, अगस्त 24, 2012

अभिमान


अपनी चुनी राह पर 
पथिक करे गुमान 
कभी कभी क्यूँ करने लगे 
मन खुद पर अभिमान।



शनिवार, अगस्त 18, 2012

आज

किस्मत से झगडना छोड दिया मैंने 
और हवाई किलों को तोड दिया मैंने 
समय से उसके पंख उपहार माँग कर 
अपने परों में जोड लिया मैंने 
अब मैं कुछ जिंदादिल दिख रही हूँ 
सिर्फ अपने आज को लिख रही हूँ । 


शुक्रवार, जुलाई 20, 2012

पृथ्वी पर बढ़ रही तपन

पृथ्वी पर बढ़ रही तपन,
पिघल रहे हिमपर्वत हर क्षण
कटते जा रहे सारे वन
मुश्किल आ पड़ी भीषण
पृथ्वी पर बढ़ रही तपन,
पिघल रहे हिमपर्वत हर क्षण
क्रंदन कर रहा कण-कण
खतरे मैं है पर्यावरण
फिर क्यूँ नहीं पिघलता मानव मन?
क्यूँ नहीं पिघलता मानव मन?


" इस ब्लॉग पर पोस्ट की गई सभी रचनाएँ मौलिक है जो की मेरी और मेरे परिवार के सदस्यों द्वारा लिखी गई है " | किताबों व अन्य प्रोडक्ट्स पर दी जानकारी अनुभव आधारित है |
धन्यवाद
नेहा मैथ्यूज़