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7/20/2012

पृथ्वी पर बढ़ रही तपन

पृथ्वी पर बढ़ रही तपन,
पिघल रहे हिमपर्वत हर क्षण
कटते जा रहे सारे वन
मुश्किल आ पड़ी भीषण
पृथ्वी पर बढ़ रही तपन,
पिघल रहे हिमपर्वत हर क्षण
क्रंदन कर रहा कण-कण
खतरे मैं है पर्यावरण
फिर क्यूँ नहीं पिघलता मानव मन?
क्यूँ नहीं पिघलता मानव मन?


10/30/2010

मेरी पहली प्रकाशित कविता

आज में आपसे बांटने वाली हूँ ,मेरी पहली प्रकाशित कविता|यह कविता २००४ में दैनिक भास्कर,स्कूल भास्कर में प्रकाशित हुई थी|यह मेरे लिए एक यादगार दिन था और एक शुरुआत भी|कविता का शीर्षक है फील गुड फैक्टर |

फील गुड फैक्टर

लो जंगल में भी आ गया
फील गुड फैक्टर
हाथी इतरा रहा है,
अपनी मस्त चाल पर
बन्दर कूद रहा है मस्ती से डाल पर|
गधे खुश है बनके पॉप सिंगर
चतुर लोमड़ी कह रही
घी में है पांचों फिंगर|
बिल्ली कह रही है अब चूहे नहीं खाऊँगी
घरों में दूध ही दूध है 
जाके चाट कर जाउंगी|
बैल कह रहे है अब मैं न बेरोजगार हूँ|
हरित क्रान्ति आई है खेतों में हल
जोतने को तैयार हूँ|
खरगोश कह रहें है जमकर 
गाजर-मुली खाऊंगा
फील गुड आया है इसका
लाभ उठाऊंगा|
ऊंट कह रहे है रेगिस्तान में जाऊंगा
पर्यटक आते है उनको लुभाऊंगा|
मोर नाच रहा है बिन बारिश के
पंछी खुश है खुला आकाश है
शेर की हो गई आँखें नम
करता है भगवान से दुआ
हमारे भी दूर हो जाये सारे गम|
सभी खुश है अंदाज
फील गुड का देखकर लो जंगल में भी आ या
फील गुड का फैक्टर|






                                                                  

10/12/2010

इंसानों ने

ईश्वर के बनाये नियमों को
तोड़ दिया इंसानों ने
दुनिया की मिलती राहों को
मोड़ दिया इंसानों ने |
राह एक थी मोड़ बन गए
देश कट गए,झंडे बंट गए
एक ईश्वर को कई धर्मों मैं
बाँट दिया इंसानों ने |
एक विश्व को बंटवारे का
कोढ़ दिया इंसानों ने |
आतंकवाद, भ्रष्टाचार का
रोग दिया इंसानों ने |
बदले की भावना पर
ज़ोर दिया इंसानों ने |
'आया नया जमाना'-कह कर
संस्कारों को छोड़ दिया इंसानों ने |
अब यह राह कहा ले जाएगी
इसका पता लगाना है
डूबेंगे या तर जायेंगे?
डूबे या तरे,सब 'वो' जानें
क्या ऐसा सोच लिया इंसानों ने?
ईश्वर के बनाये नियमों को
तोड़ दिया इंसानों ने
दुनिया की मिलती राहों को
मोड़ दिया इंसानों ने |