सम्पूर्ण सृष्टि करें नमन
कितना स्नेहिल तेरा मन
तुने दिया है यह जीवन
तुझको करती हूँ अर्पण |
नन्ही सी किलकारी से
तु कितनी खुश हो जाती थी
ऐ माँ तेरी हर लोरी
मन में मिठास दे जाती थी |
नन्हे नन्हे क़दमों को
जब तु चलना सिखलाती थी
ऐ माँ तेरे क़दमों से
मैं अपने कदम बढाती थी |
तेरे हाथों से खाया जो
प्यार भरा हर एक कौर
पेट भर भी जाये तो
जी कहता है माँ और और |
तेरी ममता की मुस्कान
मेरे दिल को छु जाती है
ऐ माँ तेरी हर एक सीख
अमिट छाप दे जाती है |
घनी धुप में छाँव वृक्ष की
सुख का आभास कराती है
ऐ माँ तेरी ममता भी
कुछ ऐसा अहसास कराती है |
सम्पूर्ण सृष्टि करें नमन
कितना स्नेहिल तेरा मन
तुने दिया है यह जीवन
तुझको करती हूँ अर्पण |
