थोड़ी ब्रज रज मुझ में भी है,
मेरे पूर्वज ब्रजवासी थे।
राधे राधे कहते होंगे,
कान्हा के संग रहते होंगे।
कृष्णमयी बन बचपन में,
जमुना तट पर खेले होंगे।
बड़े भाग्य से मिलता है
ब्रज की धरती पर जन्म सुनो।
कितने पुण्य किए होंगे,
तब जाकर धन्य हुए होंगे।
मैं भी वृन्दावन जाऊँगी,
ब्रजरज माथे पे सजाऊँगी।
कान्हा ने चाहा तो में भी
फिर ब्रजवासी बन जाऊँगी |
- नेहा की कलम से…
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें